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At the Feet of The Mother

SAVITRI Book Nine. Canto Two (Eng-Hindi)

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BOOK NINE. THE BOOK OF ETERNAL NIGHT

Canto Two. The Journey in Eternal Night and the Voice of the Darkness

 

Awhile on the chill dreadful edge of Night
All stood as if a world were doomed to die
And waited on the eternal silence’ brink.

उस कालरात्रि के ठिठुरते भयानक तट पर कुछ काल
सब ऐसे खड़े थे मानों एक जगत् मृत्यु के द्वार पर
खड़ा शाश्वत निस्तब्धता के कगार पर प्रतीक्षा करता हो।

Heaven leaned towards them like a cloudy brow
Of menace through the dim and voiceless hush.

नभ उन पर एक विपत्ति के काले मेघ के मस्तक जैसा
उस धूमिल और निःशब्द सन्नाटे में झुका हुआ था।

As thoughts stand mute on a despairing verge
Where the last depths plunge into nothingness
And the last dreams must end, they paused; in their front
Were glooms like shadowy wings, behind them pale
The lifeless evening was a dead man’s gaze.

जैसे विचार एक नैराश्य की सीमा पर आ मूक हो जाते हैं
जहां अन्तिम गहनताएं शून्य में डूब जाती हैं
और अन्तिम सपनों का भी अन्त आ जाता है, वे तनिक ठहर गये;
उनके सामने विषाद शोक-सन्ताप छायावी पक्षियों समान मण्डरा रहे थे,
उनके पीछे पीली, निर्जीव सन्ध्या एक मृत मनुष्य के नेत्र समान थी।

Hungry beyond, the night desired her soul.

परात्पर से क्षुधित, यह कालनिशा उसकी आत्मा की भूखी थी।

But still in its lone niche of templed strength
Motionless, her flame-bright spirit, mute, erect,
Burned like a torch-fire from a windowed room
Pointing against the darkness’ sombre breast.

किन्तु अभी भी अपने शक्तिरूपी देवालय के एकाकी आले में
अचल स्थिर सावित्री की प्रज्वलित चैत्य सत्ता की दीपशिखा, मौन, सीधी ऊर्ध्व में
एक मशाल समान अन्तर्कक्ष के एक गवाक्ष पर, जल रही थी
और इस अन्धकार की भीषण छाती को बेध रही थी।

The Woman first affronted the Abyss
Daring to journey through the eternal Night.

उस दिव्या मानवी ने पहले उस असत् गर्त का सामना किया
उस शाश्वत कालनिशा के मध्य यात्रा करने का साहस किया।

Armoured with light she advanced her foot to plunge
Into the dread and hueless vacancy;
Immortal, unappalled her spirit faced
The danger of the ruthless eyeless waste.

ज्योति से सज्जित उसने अपना चरण आगे बढ़ा
उस विभीषिका और निर्गुणी रिक्तता में डुबो दिया;
अमर, अभय, उसकी चैत्यात्मा ने सामना किया
उस निर्मम निष्ठुर नेत्रहीन बंजर उजाड़ संकट का।

Against night’s inky ground they stirred, moulding
Mysterious motion on her human tread,
A swimming action and a drifting march
Like figures moving before eyelids closed:
All as in dreams went slipping, gliding on.

रात्रि की काली स्याह पृष्ठभूमि के विरुद्ध वे कुछ हिले-डुले,
अपनी मानवी चाल को उस रहस्यपूर्ण संचालन में ढालती,
यह एक तैरने की प्रक्रिया और एक बहती-सी प्रगति थी
निद्रा में पलकों के बन्द होने से पहले आकृतियों के संचालन सम दीखतीः
मानों सब सपनों के लोक में रपटते फिसलते जा रहे थे।

The rock-gate’s heavy walls were left behind;
As if through passages of receding time
The present and past into the Timeless lapsed;
Arrested upon dim adventure’s brink, [582]
The future ended drowned in nothingness.

चट्टानी द्वारों की भारी दीवारें पीछ छूट गयी थीं;
जैसे कि पीछे हटते काल के गलियारों के मध्य
वर्तमान और भूतकाल अकाल में लोप हो गये;
धूमिल साहसी-यात्रा के तट पर बन्दी बना,
भविष्य असार शून्य में डूब मिट गया।

Amid collapsing shapes they wound obscure;
The fading vestibules of a tenebrous world
Received them, where they seemed to move and yet
Be still, nowhere advancing yet to pass,
A dumb procession a dim picture bounds,
Not conscious forms threading a real scene.

ध्वंस होते आकारों के मध्य वे धूमिलता में चक्कर खाते,
एक जटिल नैराश्यपूर्ण लोक के धुंधलाते काले प्रकोष्ठों ने
उन्हें अन्तर में ले लिया, जहां वे स्थिर होते हुए भी चलते जैसे लगते,
कहीं पर आगे बढ़ते नहीं थे फिर भी चल रहे थे,
एक धुंधलाये चित्र में बंधा हुआ एक मूक दल हो जैसे,
एक वास्तविक दृश्य में पांव बढ़ाती अचेत आकृतियों के जैसे।

A mystery of terror’s boundlessness,
Gathering its hungry strength the huge pitiless void
Surrounded slowly with its soundless depths,
And monstrous, cavernous, a shapeless throat
Devoured her into its shadowy strangling mass,
The fierce spiritual agony of a dream.

आतंक की असीमता के एक रहस्य ने
अपने भूखे बल को उस घोर निर्दयी शून्य में एकत्र कर
निःशब्द नीरव गहनताओं से उसे चहुं ओर से घेर लिया,
और दैत्याकार, सुरंग सम, एक कुरूप गलकण्ठ ने
सावित्री को अपने प्रेताकार दमघोंटू घनता में निगल लिया,
यह एक स्वप्न की अति त्रासदायी आध्यात्मिक अवस्था थी।

A curtain of impenetrable dread,
The darkness hung around her cage of sense
As, when the trees have turned to blotted shades
And the last friendly glimmer fades away,
Around a bullock in the forest tied
By hunters closes in no empty night.

अभेद्यकारी भयानकता को एक पट बना,
यह अन्धकार उसके बोधरूपी पिंजरे के चहुं ओर लटका हुआ था
यथा, जब सूर्य के मैत्रीभाव की अन्तिम झलक मिट जाती है
तब वृक्ष सब छायाओं के धब्बों समान रह जाते हैं,
मानों निषेधकारी सूनी निशा में वन में बंधे
एक बैल को चहुं ओर से शिकारी घेरते आते हों।

The thought that strives in the world was here unmade;
Its effort it renounced to live and know,
Convinced at last that it had never been;
It perished, all its dream of action done:
This clotted cypher was its dark result.

वह विचार जो संसार में प्रयासरत है यहां मिटा दिया गया,
इसने अपने जीवित रहने और जानने के प्रयासों को त्याग दिया,
अन्त में यह विश्वास कर लिया गया कि इसका कभी अस्तित्व नहीं था:
यह नष्ट हो गया, इसके कर्मों का सपना समाप्त हो गया,
एक शून्याकार धब्बे के रूप में इसका परिणाम शेष रह गया।

In the smothering stress of this stupendous Nought
Mind could not think, breath could not breathe, the soul
Could not remember or feel itself; it seemed
A hollow gulf of sterile emptiness,
A zero oblivious of the sum it closed,
An abnegation of the Maker’s joy
Saved by no wide repose, no depth of peace.

इस विकराल महाशून्य के दमनकारी दबाव में
चित्त चिन्तन नहीं कर पाया, प्राण श्वास नहीं भर पाया,
आत्मसत्ता स्वयं की स्मृति और अनुभूति खो बैठी;
बंजर रिक्तता की एक खोखली खाड़ी सम दिखती,
अपने द्वारा बन्द किये विस्मृत योगफल की एक शून्य-सी,
स्रष्टा के हर्षोल्लास की एक निषेध थी
जिसे किसी विश्राम का विस्तार, किसी शान्ति की गहनता बचा नहीं पायी थी।

On all that claims here to be Truth and God
And conscious self and the revealing Word
And the creative rapture of the Mind
And Love and Knowledge and heart’s delight, there fell
The immense refusal of the eternal No.[583]

यहां पर जो परम-सत्य और ईश्वर होने का दावा करता है
और चित्सत्ता और सर्वदर्शी परा-शब्द का
और सत्यमानस की आह्लादकारी सृष्टि का
और दिव्य प्रेम औ’ विज्ञान और हृदय के आनन्द का अधिकार जताता,
इन सब पर वहां इस शाश्वत घोर-नकार का भीषण निषेध आ गिरा।

As disappears a golden lamp in gloom
Borne into distance from the eye’s desire,
Into the shadows vanished Savitri.

घोर नैराश्य के अन्धकार में ज्यों एक स्वर्ण दीपशिखा विलीन हो जाये
नेत्रों की काम्य दृष्टि से दूर कहीं ले जायी जाये,
वैसे ही सावित्री उन छायाओं में लोप हो गयी।

There was no course, no path, no end or goal:
Visionless she moved amid insensible gulfs,
Or drove through some great black unknowing Waste
Or whirled in a dumb eddy of meeting winds
Assembled by the titan hands of Chance.

वहां कोई मार्ग, कोई अन्त, कोई लक्ष्य या दिशा नहीं थी:
उन संज्ञाहीन खाड़ियों के मध्य वह दृष्टिहीन भटकती रही,
या किसी विशाल काले अज्ञ उजाड़ क्षेत्र के मध्य हांयी जाती रही,
या पवनों के मेल से बने एक मूढ़ भंवर में घूमती चक्कर खाती रही
जिसे दैवी नियति के भीषण करों ने एकत्रित कर रचा था।

There was none with her in the dreadful Vast:
She saw no more the vague tremendous god,
Her eyes had lost their luminous Satyavan.

उस भयानक घोर विस्तार में उसके साथ कोई नहीं था:
वह भीषण धूमिल यम देवता भी उसकी आंखों से ओझल था,
और सत्यवान् का दीप्तिमय आकार भी उसे दिखायी नहीं दे रहा था।

Yet not for this her spirit failed, but held
More deeply than the bounded senses can
Which grasp externally and find to lose
Its object loved. So when on earth they lived
She had felt him straying through the glades, the glades
A scene in her, its clefts her being’s vistas
Opening their secrets to his search and joy,
Because to jealous sweetness in her heart
Whatever happy space his cherished feet
Preferred, must be at once her soul embracing
His body, passioning dumbly to his tread.

पर तब भी उसकी चैत्य शक्ति को यह हरा नहीं पाया था,
इसने अपने प्रियतम को और गहनता से पकड़ा हुआ था
इन दास इन्द्रियों की अपेक्षा अधिक शक्ति से धारण कर रखा था
जो अपनी प्रिय वस्तु को बाहर से अधिकृत कर पाती हैं, केवल खोने को।
इसीलिए जब वे पृथ्वी पर जीवित थे वह बहुधा उसे वन में विचरते अनुभव करती,
वे वन पथ मानों उसके अन्तर दृश्य थे, इसकी फाटनें उसकी सत्ता की ही
दृश्यावलियां थीं जो अपने रहस्य सत्यवान् के संधान और हर्ष हित खोल देतीं,
क्योंकि अपने हृदय के ईर्ष्यालु माधुर्य से भरी
वह उन्हें सुखद क्षेत्रों को चुनती जहां उसके प्रिय चरण पड़ते,
उन्हें तुरन्त उसकी देह सम वह अपनी आत्म-चेतना से आलिंगन करती,
प्रेमावेश में भर उसके मार्ग का मूक भाव से अनुसरण करती।

But now a silent gulf between them came
And to abysmal loneliness she fell,
Even from herself cast out, from love remote.

किन्तु अब उनके मध्य एक नीरव खाड़ी फैली हुई थी
और वह उस अतल एकाकीपन में डूब गयी थी,
अभी तो वह स्वयं से निष्कासित थी, प्रेम से अति दूर थी।

Long hours, since long it seems when sluggish time
Is measured by the throbs of the soul’s pain,
In an unreal darkness empty and drear
She travelled treading on the corpse of life,
Lost in a blindness of extinguished souls.

क्योंकि शिथिल काल अति दीर्घ लगता है जब इसे आत्मा की
यातना-पूर्ण धड़कनों से मापा जाता है, अतः घड़ियां अति दीर्घ थीं,
एक असत् अन्धकार जो शून्य और नीरस था
इसमें वह जीवन के शव पर मानों यात्रा करती चल रही थी,
बुझ चुकी अन्तरात्माओं के एक अन्धेपन में खोयी-सी।

Solitary in the anguish of the void
She lived in spite of death, she conquered still;
In vain her puissant being was oppressed:
Her heavy long monotony of pain
Tardily of its fierce self-torture tired.

उस रीतेपन की वेदना में एकाकी
मृत्यु के साथ में भी वह जीवित थी, फिर भी विजयी थी;
उसकी शक्तिशाली सत्ता निष्फल ही उत्पीड़ित की जा रही थी:
पीड़ा स्वयं जैसे सावित्री को दी जा रही दीर्घ बोझिल नीरसता की
अपनी भयानक आत्मप्रताड़ित यातना से थक गयी थी।

At first a faint inextinguishable gleam, [584]
Pale but immortal, flickered in the gloom
As if a memory came to spirits dead,
A memory that wished to live again,
Dissolved from mind in Nature’s natal sleep.

फिर पहली बार एक मन्द अविनाशी किरण झलकी,
जो तेजहीन होकर भी अमर थी, उस अन्धी काली निराशा में टिमटिमायी
जैसे मृत प्राणों में एक स्मृति लौट आयी हो,
एक स्मृति जो फिर से जीने की इच्छा रखती हो,
जो जड़-स्वभाव की गर्भनिद्रा में चित्त से मिट गयी थी।

It wandered like a lost ray of the moon
Revealing to the night her soul of dread;
Serpentine in the gleam the darkness lolled,
Its black hoods jewelled with the mystic glow;
Its dull sleek folds shrank back and coiled and slid,
As though they felt all light a cruel pain
And suffered from the pale approach of hope.

यह सुधाकर की एक खोयी किरण सम भटक रही थी
उस निशा को उसकी भीषण चेतना दर्शाती,
उस किरण की झलक में यह घोर अन्धकार सर्पाकार दिखता रेंग रहा था,
जिसका काल-फण गुह्य आभा से जगमगा रहा था;
इसकी धूमिल चिकनी पर्तें पीछे हट गयीं और यह कुण्डलित हो सरक गया,
जैसे कि उन्हें सकल प्रकाश एक निष्ठुर पीड़ा दे रहा था,
और आशा की उस क्षीण किरण के आगमन से वे व्यथित हो उठे थे।

Night felt assailed her heavy sombre reign;
The splendour of some bright eternity
Threatened with this faint beam of wandering Truth
Her empire of the everlasting Nought.

घोर निशा ने अपने बोझिल नैराश्य के राज्य पर आक्रमण होता अनुभव किया;
किसी तेजोमय चिरन्तन की इस शोभा ने
भटकते परम सत्य की इस क्षीण-सी किरण ने
अनन्त निषेधकारी शून्यता के उस साम्राज्य को आशंकित कर दिया।

Implacable in her intolerant strength
And confident that she alone was true,
She strove to stifle the frail dangerous ray;
Aware of an all-negating immensity
She reared her giant head of Nothingness,
Her mouth of darkness swallowing all that is;
She saw in herself the tenebrous Absolute.

अपनी असहिष्णु शक्ति से पूरित अदमनीय
और मात्र एक वही सत्य है इस विश्वास से भरी
उस निशा ने उस दुर्बल संकटकारिणी क्षीण रश्मि को कुचलने का प्रयास किया;
एक सर्व निषेधकारी विराटता के प्रति सचेत हो
उसने अपना घोर शून्यता का विशाल विकट शीश उठा
अपने अन्धकारी मुख में जो सब सत् वहां था उसे निगल लिया;
उसने अपने अन्तर में उस अन्धकार रूप परम तत्व को देखा।

But still the light prevailed and still it grew,
And Savitri to her lost self awoke;
Her limbs refused the cold embrace of death,
Her heart-beats triumphed in the grasp of pain;
Her soul persisted claiming for its joy
The soul of the beloved now seen no more.

किन्तु फिर भी वह ज्योति वहां व्याप्त रही और वर्धित होती गयी,
और सावित्री भी अपनी लुप्त चेतना के प्रति जाग उठी;
उसकी सत्ता के अंगों ने मृत्यु के ठंडे जड़ आलिंगन को अस्वीकार दिया,
पीड़ा से ग्रसित उसके हृदय की धड़कनें अब विजयी थीं;
उसकी चैत्य सत्ता अपने आनन्द के अधिकार को दृढ़ता से मांग रही थी
अपने प्रियतम की जीवात्मा को जो अब कहीं दिखायी नहीं दे रही थी।

Before her in the stillness of the world
Once more she heard the treading of a god,
And out of the dumb darkness Satyavan,
Her husband, grew into a luminous shade.

उस लोक की नीरव स्थिरता में अपने सम्मुख सावित्री ने
एक बार पुनः एक देवता के पदचापों की ध्वनि सुनी,
और उस मूक अन्धता से बाहर सत्यवान् की भी सुनी,
उसका पति, एक चमकती परछाईं में विकसित हो उठा।

Then a sound pealed through that dead monstrous realm:
Vast like the surge in a tired swimmer’s ears,
Clamouring, a fatal iron-hearted roar,
Death missioned to the night his lethal call.[585]

तब उस मृत भयावने राज्य के मध्य एक नाद बिजली सम कड़का:
एक क्लान्त तैराक के कानों में जो महोर्मि सम घोर लगा,
विरोध में चीखती, एक वज्र हृदय की घातक गर्जना,
मृत्यु-देवता ने अपनी प्राण-घातक पुकार को उस रात्रि में पठाया।

“This is my silent dark immensity,
This is the home of everlasting Night,
This is the secrecy of Nothingness
Entombing the vanity of life’s desires.

‘‘यह मेरी नीरव गहन काली अनन्तता है,
यह मेरी अनन्त कालरात्रि का धाम है,
महाशून्य चरमता की यह गुह्यता है
इसी में जीवन-कामनाओं का दर्प दफनाया जाता है।

Hast thou beheld thy source, O transient heart,
And known from what the dream thou art was made?

ओ क्षणभंगुर प्राणी क्या तूने अपना उद़्गम देख लिया है
और क्या जान गयी है कि तेरा स्वप्न किस तत्त्व से रचित है?

In this stark sincerity of nude emptiness
Hopest thou still always to last and love?”

इस नग्न रिक्तता की इस नितान्तपूर्ण सत्यशीलता में
तू अभी भी सदैव जीने और अमर प्रेम की आशा रखती है?’’

The Woman answered not. Her spirit refused
The voice of the Night that knew and Death that thought.

उस दिव्या नारी ने उत्तर नहीं दिया। उसकी चैत्य सत्ता ने
ज्ञानी कालरात्रि की वाचा और मनीषी यम के विचार का निषेध किया।

In her beginningless infinity
Through her soul’s reaches unconfined she gazed;
She saw the undying fountains of her life,
She knew herself eternal without birth.

सावित्री ने अपनी आत्मा के मुक्त विस्तारों से
अपनी अनादि अनन्तताओं की ओर अवलोका;
उसने अपने जीवन के अमर स्रोतों को देखा,
एवं स्वयं को शाश्वत अजन्मा जाना।

But still opposing her with endless night
Death, the dire god, inflicted on her eyes
The immortal calm of his tremendous gaze:
“Although thou hast survived the unborn void
Which never shall forgive, while Time endures,
The primal violence that fashioned thought,
Forcing the immobile Vast to suffer and live
This sorrowful victory only hast thou won
To live for a little without Satyavan.

किन्तु फिर भी यम अपनी अनन्त रात्रि द्वारा उसका विरोध करता,
वह भीषण देवता अपनी अमर स्थिर एकटक चितवन से घूरता
उसे देख रहा था और उसके नयनों को आहत कर बोला:
‘‘यद्यपि तू इस अजन्मी शून्यता में पहुंचकर भी जीवित है,
पर यह तुझे कभी भी जब तक काल का अस्तित्व है क्षमा नहीं करेगी,
वह आदि हिंसा जिसने विचार का रूपायन किया था,
उसने अटल विराट् को यातना दे जीने को बाध्य किया है,
यह शोचनीय विजय केवल तू ही कर पायी है
बिना सत्यवान् के जीवित रहने की एक छोटी-सी अवधि के लिए।

What shall the ancient goddess give to thee
Who helps thy heart-beats? Only she prolongs
The nothing dreamed existence and delays
With the labour of living thy eternal sleep.

वह आदि पुरातन देवी जो तेरे हृदय-तन्त्री की नियन्त्रिका है
इसके सिवाय तुझे और क्या देगी? केवल वही तो तेरे रीते
सपनों के अस्तित्व को और दीर्घ बना रही है और जीवन के
परिश्रम को बढ़ाकर तेरी शाश्वत निद्रा में विलम्ब कर रही है।

A fragile miracle of thinking clay,
Armed with illusions walks the child of Time.

चिन्तन की माटी से रचित एक भंगुर चमत्कार,
भ्रामकताओं से सज्जित दिक्काल का यह मानव शिशु विचरता है।

To fill the void around he feels and dreads,
The void he came from and to which he goes,
He magnifies his self and names it God.

अपने इस रीतेपन को भरने के प्रयास में वह अनुभव करता
एवं भयभीत होता है, फिर जिस शून्य से वह आया उसी में लौट जाता है,
वह अपनी आत्मसत्ता को वर्धित कर उसे परमात्मा कह बुलाता है।

He calls the heavens to help his suffering hopes.

वह सुरलोक को अपनी व्यथित आशाओं की सहायता हित पुकारता है।

He sees above him with a longing heart
Bare spaces more unconscious than himself
That have not even his privilege of mind [586]
And empty of all but their unreal blue
And peoples them with bright and merciful powers.

एक लालायित हृदय से भर वह ऊपर ताकता है
शून्य आकाशों की ओर जो उससे भी अधिक अचेत हैं
जिनके पास तो मानव-मन का विशेष अधिकार भी नहीं है,
और अपनी असत् नीलिमा के सिवाय सबसे शून्य हैं,
पर मानव इन्हें दीप्तिमय और कृपालु शक्तियों से आबाद कर देता है।

For the sea roars around him and earth quakes
Beneath his steps, and fire is at his doors,
And death prowls baying through the woods of life.

क्योंकि उसके चहुं ओर सागर गरजता और पांव तले
कम्पित धरा है, उसके द्वारों पर अग्नि ज्वालाएं प्रज्वलित हैं,
और जीवन के जंगलों में मृत्यु दबे पांव भौंकती घूमती है।

Moved by the Presences with which he yearns,
He offers in implacable shrines his soul
And clothes all with the beauty of his dreams.

इन दिव्य सान्निध्यों के लिए लालायित जो उसके संचालक हैं,
वह अपनी अन्तरात्मा को उन अशम्य वेदिकाओं पर अर्पित कर
अपने सपनों की कल्पित सुन्दरता से उन सबको सजा देता है।

The gods who watch the earth with sleepless eyes
And guide its giant stumblings through the void,
Have given to man the burden of his mind;
In his unwilling heart they have lit their fires
And sown in it incurable unrest.

ये देवता इस पृथ्वी की अनिद्रित नेत्रों से रखवाली करते हैं
और शून्याकाश के मध्य इसकी भीषण लड़खड़ाती गति का मार्गदर्शन करते हैं,
उन्होंने ही मानव को मानसिकता का भार प्रदान किया है;
उसके अनिच्छुक हृदय में उन्होंने अपनी ज्वालाएं प्रज्वलित कर दी हैं
और मन में असाध्य व्याकुल अशान्ति का बीज रोप दिया है।

His mind is a hunter upon tracks unknown;
Amusing Time with vain discovery,
He deepens with thought the mystery of his fate
And turns to song his laughter and his tears.

उसका मन अज्ञात पथों पर एक शिकारी सम भटकता है;
अपने गर्वीले आविष्कार से अपने युग का मनोरंजन करता है,
मनन द्वारा वह अपने भाग्य के रहस्य को गूढ़तर बना देता है
अपने हास्य और आंसुओं का गीत रच गाता फिरता है।

His mortality vexing with the immortal’s dreams,
Troubling his transience with the infinite’s breath
They gave him hungers which no food can fill;
He is the cattle of the shepherd gods.

उसकी मर्त्यता अमरत्व के सपनों से उत्पीड़ित है,
जो उसकी क्षणभंगुरता को अविनाशी के श्वास से व्यथित कर देते हैं,
उन्होंने उसे जो भूख प्रदान की है उसे कोई अन्न तृप्ति नहीं दे पाया है;
वह तो पशु है और देवता उसके चरवाहे हैं।

His body the tether with which he is tied,
They cast for fodder grief and hope and joy:
His pasture ground they have fenced with Ignorance.

उसकी देह वह खूंटा है जिससे वह बंधा रहता है,
वे उसे दुःख औ’ आशा औ’ हर्ष का चारा डालते हैं:
उसकी चरागाही भूमि को उन्होंने अविद्या की बाड़ से घेर रखा है।

Into his fragile undefended breast
They have breathed a courage that is met by death,
They have given a wisdom that is mocked by night,
They have traced a journey that foresees no goal.

उसके भंगुर असुरक्षित वक्ष में
उन्होंने एक शौर्य का मन्त्र फूंक दिया है जिसका अन्त मृत्यु है,
एक ऐसा ज्ञान दिया है जिसका अज्ञ रात्रि भी उपहास करती है,
एक ऐसी यात्रा का मानचित्र आंका है जिसका कोई लक्ष्य नहीं है।

Aimless man toils in an uncertain world
Lulled by inconstant pauses of his pain,
Scourged like a beast by the infinite desire,
Bound to the chariot of the dreadful gods.

उद्देश्यहीन मानव एक अनिश्चित लोक में श्रम करता रहता है,
अपनी पीड़ा के अनियमित पड़ावों पर कुछ विश्राम कर लेता है,
चिर-कामना के द्वारा एक पशु सम खदेड़ा जाता है,
वह इन भीषण देवताओं के रथ से बांध दौड़ाया जाता है।

But if thou still canst hope and still wouldst love,
Return to thy body’s shell they tie to earth,
And with thy heart’s little remnants try to live.

किन्तु तू अभी भी यदि आशा रखती और प्यार चाहती है,
तो तू निज काया के खोल में लौट जा, यही धरती से बांधती तेरी ग्रन्थि है,
और निज हृदय के अल्प अवशेषों के साथ जीने का प्रयत्न कर।

Hope not to win back to thee Satyavan. [587]

तू विजयी हो, सत्यवान् को ले जाने की आशा त्याग दे।

Yet since thy strength deserves no trivial crown,
Gifts I can give to soothe thy wounded life.

तथापि तेरी सामर्थ्य तुच्छ नहीं है यह तो उचित सम्मान के योग्य है,
अत: तेरा आहत जीवन संवारने को मैं तुझे वरदान दूंगा।

The pacts which transient beings make with fate,
And the wayside sweetness earth-bound hearts would pluck,
These if thy will accepts make freely thine.

यही समझौता नश्वर प्राणी निज भाग्य के साथ करते हैं,
और इस मार्ग के माधुर्यों को पृथ्वीगामी हृदय प्रसन्न हो चुन लेते हैं,
इन्हें यदि तेरी इच्छा स्वीकारती है तो मुक्त हो मांग ले।

Choose a life’s hopes for thy deceiving prize.”

इस जीवन की आशाओं हित अपने वंचक पुरस्कार चुन ले।’’

As ceased the ruthless and tremendous Voice,
Unendingly there rose in Savitri
Like moonlit ridges on a shuddering flood
A stir of thoughts out of some silence born
Across the sea of her dumb fathomless heart.

ज्यों ही वह निर्मम और भीषण देववाचा थमी,
सावित्री के अन्तर में वहां अविराम उठने लगी,
एक ज्योत्स्ना समान एक कम्पित जलप्लावन पर चमक उठी,
विचारों की एक आन्दोलित-धारा जो किसी नीरवता से उत्पन्न हो
उसके मूक अगाध हृदय सागर तक आ पहुंची थी।

At last she spoke; her voice was heard by Night:
“I bow not to thee, O huge mask of Death,
Black lie of night to the cowed soul of man,
Unreal, inescapable end of things,
Thou grim jest played with the immortal spirit.

अन्त में वह बोली; उसकी वाणी उस काली अन्धरात्रि ने सुनी:
‘‘ओ मृत्यु के विशाल मुखौटे, मैं तेरे आगे नहीं झुकूंगी,
मानव की भीत नमित प्राणसत्ता के लिए तू रात्रि का काला असत्य है,
असत् है, पदार्थों का अनिवार्य अन्त है,
अमर अन्तरात्मा से किया गया निर्मम उपहास है।

Conscious of immortality I walk.

मैं तो अपने अमरतत्त्व में सचेत विचरण करती हूं।

A victor spirit conscious of my force,
Not as a suppliant to thy gates I came:
Unslain I have survived the clutch of Night.

अपनी शक्ति के प्रति सचेत एक विजयी चैत्यसत्ता हूं,
तेरे द्वार पर मैं एक प्रार्थिनी बन नहीं आयी हूं:
कालरात्रि के पंजे से मैं अवधित सुरक्षित निकली हूं।

My first strong grief moves not my seated mind;
My unwept tears have turned to pearls of strength:
I have transformed my ill-shaped brittle clay
Into the hardness of a statued soul.

यह मेरा प्रथम कठोर सन्ताप मेरे स्थिर चित्त को विचलित नहीं कर पाया;
मेरे अरुदित अश्रु-कण ही शक्ति की मुक्ता में बदल गये हैं:
मैंने अपनी कुरूप भंगुर माटी का रूपान्तर
एक वज्र आत्म-प्रतिमा की दृढ़ता में कर लिया है।

Now in the wrestling of the splendid gods
My spirit shall be obstinate and strong
Against the vast refusals of the world.

इन भव्य देवताओं के मल्ल-युद्ध में
इस जगत् की विशाल अस्वीकृति के विरोध में
अब मेरी आत्मा दृढ़ और व्रती पूर्णशक्ति से स्थिर है।

I stoop not with the subject mob of minds
Who run to glean with eager satisfied hands
And pick from its mire mid many trampling feet
Its scornful small concessions to the weak.

मैं दास-मनों की भीड़ समान नहीं झुकूंगी
जो सन्तुष्ट हो उत्सुक करों से बटोरने दौड़ पड़ती है
और अनेक पांवों तले कीचड़ में कुचली जाती है
ओ’ दीन-दुर्बलों हित दिये गये तुच्छ तिरस्कृत वरदानों को चुन लेती है।

Mine is the labour of the battling gods:
Imposing on the slow reluctant years
The flaming will that reigns beyond the stars,
They lay the law of Mind on Matter’s works
And win the soul’s wish from earth’s inconscient force.[588]

मेरा परिश्रम तो संघर्षरत देवताओं का है:
यह प्रज्वलित संकल्प है, जो तारों से परे शासन करता है
और मन्द अनिच्छुक वर्षों पर इसे अध्यारोपित कर रहा है,
देवों ने मनःशक्ति का विधान पंच महाभूत के कार्यों पर लगाया है
और पृथ्वी की अचित् ऊर्जा से चैत्य-पुरुष को अभीप्सा द्वारा विजित किया है।

First I demand whatever Satyavan,
My husband, waking in the forest’s charm
Out of his long pure childhood’s lonely dreams,
Desired and had not for his beautiful life.

र्वप्रथम मेरा दावा सत्यवान् के लिए है,
मेरे पति ने, वन्य शोभा में जाग, सचेत हो
अपने दीर्घ निष्पाप बचपन के एकाकी सपनों में,
जो कामना की थी पर अपने सुन्दर जीवन में उसे प्राप्त नहीं कर पाया।

Give, if thou must, or if thou canst, refuse.”

उसे प्रदान कर, यदि तुझे देना है तो, या नहीं दे सकता तो इन्कार कर दे।’’

Death bowed his head in scornful cold assent,
The builder of this dreamlike earth for man
Who has mocked with vanity all gifts he gave.
Uplifting his disastrous voice he spoke:
“Indulgent to the dreams my touch shall break,
I yield to his blind father’s longing heart
Kingdom and power and friends and greatness lost
And royal trappings for his peaceful age,
The pallid pomps of man’s declining days,
The silvered decadent glories of life’s fall.

यम ने निज शीश अवहेलनापूर्ण ठंडी स्वीकृति में झुका लिया,
मानव के लिए इस स्वप्नवत् पृथ्वी का वह निर्माता
दर्प से प्रदत्त अपने सकल उपहारों का उपहास करता हुआ,
अपनी विकराल घोर वाणी को ऊंचा कर वह बोलाः
‘‘उन सपनों में खोयी है जो मेरे स्पर्शमात्र से टूट जाते हैं,
जा, मैं उसके अन्धे पिता के लालायित अन्तर हित देता हूं
उनका खोया साम्राज्य एवं सामर्थ्य और मित्र बन्धु
तथा सकल राजसी-वैभव एवं प्रतिभा उनकी शान्तिपूर्ण आयु के लिए,
जो मानव की ढलती-वयस हित मात्र निस्तेज शोभाएं हैं,
जीवन के पतन की क्षीण होती रजत महत्ताएं हैं।

To one who wiser grew by adverse fate,
Goods I restore the deluded soul prefers
To impersonal nothingness’s bare sublime.

उस व्यक्ति के लिए जिसे विपरीत भाग्य ने विज्ञता प्रदान की है,
मैं वे सकल पदार्थ देता हूं जो एक माया में लिप्त जीव चाहता है
जिन्हें वह इस उदासीन शून्य की रिक्तता से उदात्त मानता है।

The sensuous solace of the light I give
To eyes which could have found a larger realm,
A deeper vision in their fathomless night.

उनके नेत्रों की ज्योति का इन्द्रिय सुख देता हूं; वे यदि चाहते
तो अपने अन्तर में एक बृहत्तर साम्राज्य पा सकते थे
अपनी अगाध-रात्रि में एक गहनतर दर्शन पा सकते थे।

For that this man desired and asked in vain
While still he lived on earth and cherished hope.

क्योंकि यही इस जीव पुरुष की कामना और निष्फल याचना रही थी
जब यह पृथ्वी पर जीवित मानव था यही इसकी प्रिय अभिलाषा थी।

Back from the grandeur of my perilous realms
Go, mortal, to thy small permitted sphere!

जा अब लौट जा, ओ मानवी, मेरे इन भीषण राज्यों के प्रभावों से परे
अपनी छोटी-सी लघु सीमाओं की स्वीकृत परिधि में।

Hasten swift-footed, lest to slay thy life
The great laws thou hast violated, moved,
Open at last on thee their marble eyes.”

शीघ्रता से दौड़ती चली जा, जिससे कहीं तेरे जीवन का अन्त न कर दें;
ये दैवी-विधान जिनका तूने उल्लंघन किया है, अन्त में
ये व्याकुल हो अपने पाषाणी नेत्रों को खोल, तेरा वध न कर डालें।’’

But Savitri answered the disdainful Shade:
“World-spirit, I was thy equal spirit born.

किन्तु सावित्री ने उस अवज्ञा से भरी घोर प्रेत-छाया को उत्तर दिया:
‘‘हे जग की आत्मा, मैं तेरे समकक्ष जन्मी एक चैतन्य आत्मा हूं।

I am immortal in my mortality.

मेरा संकल्प एक विधान है, मेरी शक्ति देवत्व की है।

I tremble not before the immobile gaze
Of the unchanging marble hierarchies
That look with the stone eyes of Law and Fate.

मैं अपनी अनित्यता में नित्य हूं।
मैं तेरी अपरिवर्तनशील दृढ़ परम्पराओं की
इस अचल स्थिर दृष्टि से नहीं डरती,
जो दैवी-विधान और दैव-नियति की पाषाणी चितवन से देखती हैं।

My soul can meet them with its living fire.

मेरी आत्मा अपनी जाग्रत् अग्नि से उनका सामना कर सकती है।

Out of thy shadow give me back again [589]
Into earth’s flowering spaces Satyavan
In the sweet transiency of human limbs
To do with him my spirit’s burning will.

अपनी छाया से मुक्त कर मुझे सत्यवान् फिर से लौटा दे;
धरती के फलते-फूलते क्षेत्रों को उसकी आवश्यकता है
अपने मधुर क्षणिक मानवीय अंगों में उसे लौट जाने दे
जिससे मेरी आत्मा का ज्वलन्त व्रत उसके साथ पूर्ण हो सके।

I will bear with him the ancient Mother’s load,
I will follow with him earth’s path that leads to God.

उसके साथ मैं आदि मां भगवती का कार्य सम्पन्न करूंगी,
उसका अनुसरण करती इस पार्थिव यात्रापथ से प्रभु तक जा पहुंचूंगी।

Else shall the eternal spaces open to me
While round us strange horizons far recede,
Travelling together the immense unknown.

अन्यथा ये शाश्वत दिशाएं मेरे लिए खुलती जायेंगी,
और हमारे चहुं ओर के ये अद्भुत क्षितिज और पीछे हटते जायेंगे,
इस विराट् अज्ञात में हम एक संग चलते रहेंगे।

For I who have trod with him the tracts of Time,
Can meet behind his steps whatever night
Or unimaginable stupendous dawn
Breaks on our spirits in the untrod Beyond.

क्योंकि मैं तो उसके साथ युग-पथों से चलती आयी हूं,
उसके कदमों को अनुसरती मैं सब प्रकार की निशा का सामना कर सकती हूं
या किसी अकल्पित विस्मयकारी भीषण उषा को भेंट सकती हूं
जो उस अगम्य परात्परता से हमारी आत्माओं पर उदित हो सकती है।

Wherever thou leadst his soul I shall pursue.”

तू उसके जीव को जहां भी ले जायेगा मैं पीछा करूंगी।’’

But to her claim opposed, implacable,
Insisting on the immutable Decree,
Insisting on the immitigable Law
And the insignificance of created things,
Out of the rolling wastes of night there came
Born from the enigma of the unknowable depths
A voice of majesty and appalling scorn.

किन्तु उसके दावे की विरोधिनी, अशमित कालरात्रि की वाणी,
जो अपरिवर्तनशील दैवी आज्ञप्ति पर अटल थी,
अमिट दैवी-विधान की पूर्ति का आग्रह रखती
और समस्त सृष्ट वस्तुओं की नगण्यता पर बल दे रही थी,
उस रात्रि के उलटते-पलटते चक्कर खाते अपशेषों से उभरी
उन अज्ञ गहनताओं की गुह्यताओं से उत्पन्न हुई
प्रभुत्व की एक वाचा जो गर्वित और तिरस्कार से पूर्ण थी।

As when the storm-haired Titan-striding sea
Throws on a swimmer its tremendous laugh
Remembering all the joy its waves had drowned,
So from the darkness of the sovereign night
Against the Woman’s boundless heart arose
The almighty cry of universal Death:
“Hast thou god-wings or feet that tread my stars,
Frail creature with the courage that aspires,
Forgetting thy bounds of thought, thy mortal role?

मानों झंझावाती-केशों को उड़ाता दैत्य-पगों को भरता सागर
जब अपनी भीषण अट्टहास करती लहरें एक तैराक पर फेंक
उसे डुबो कर, उसकी स्मृति पर हर्षित होता है,
वैसे ही उस प्रभुताशाली रात्रि के उस अन्धकार से गुंजित
उस दिव्या नारी के असीम हृदय के विरोध में जाग उठी
सर्वशक्तिशाली पुकार जो विश्व के मृत्युदेव की थी।
‘‘क्या तेरे पास देवों के पंख या पांव हैं जो मेरे लोकों पर चलेगी,
अदम्य साहस की स्वामिनी, अभीप्सु, ओ दुर्बल प्राणी,
अपने सीमित मानस को, अपनी नश्वरता को क्या भूल गयी है?

Their orbs were coiled before thy soul was formed.

जिनके ज्योतिमंडल तो तेरी चैत्य सत्ता की रचना के पहले कुण्डलित हो गये थे।

I, Death, created them out of my void;
All things I have built in them and I destroy.

मैं, यम, ने इन्हें अपनी शून्यता से स्वयं निर्मित किया था;
इन खगोलों में, सकल वस्तुओं का मैं रचनाकार हूं और मैं ही विनाशकर्ता हूं।

I made the worlds my net, each joy a mesh.

ये संसार सब मेरे जालपाश में बंधे हैं, प्रत्येक सुख एक जाल है।

A Hunger amorous of its suffering prey,
Life that devours, my image see in things.

मैं एक भीषण क्षुधा हूं जो अपने यातना पाते आहार की प्रणयी है,
जीवन जो भी भक्षण करता है, प्रत्येक पदार्थ में तू मेरी छवि देखती है।

Mortal, whose spirit is my wandering breath,[590]
Whose transience was imagined by my smile,
Flee clutching thy poor gains to thy trembling breast
Pierced by my pangs Time shall not soon appease.

मानवी, तेरी चैत्य सत्ता तो मेरा विचरण करता श्वास है,
तेरी अनित्य क्षणिकता तो मेरी कल्पित मुस्कान है,
अब तू अपनी दीन-सम्पदा को अपने कांपते वक्ष में छिपा भाग जा
मेरी पीड़ाओं से छेदित पार्थिव-काल तुझे शीघ्र शान्ति नहीं दे पायेगा।

Blind slave of my deaf force whom I compel
To sin that I may punish, to desire
That I may scourge thee with despair and grief
And thou come bleeding to me at the last,
Thy nothingness recognised, my greatness known,
Turn nor attempt forbidden happy fields
Meant for the souls that can obey my law,
Lest in their sombre shrines thy tread awake
From their uneasy iron-hearted sleep
The Furies who avenge fulfilled desire.

ओ मेरी वधिर-शक्ति की अन्धी दासी, मैं ही पाप करने को विवश करता हूं,
फिर दण्ड देता हूं, कामना से भर देता हूं
जिससे मैं तुझे दुःख और निराशा से यातना दे कोंच सकूं
और अन्त में तू लहूलुहान हो मेरी शरण में आ जाये,
तेरी नगण्यता जग-विदित है, मेरी महत्ता सब जानते हैं,
लौट जा, इन निषेधित आनन्द क्षेत्रों में जाने का प्रयास न कर,
ये तो केवल उन जीवों के लिए हैं जो मेरे विधान का अनुसरण करते हैं,
ऐसा न हो कि कहीं तेरी चरण-चाप इन निरानंदी समाधि में सोये
जीवों की अशमित कठोर समाधि भंग कर, उन भीषण अशान्त चण्डिकाओं को जगा दे
जो परिपूर्ण कामना की विरोधिनी हैं और प्रतिशोध पर उतर आती हैं।

Dread lest in skies where passion hoped to live,
The Unknown’s lightnings start and terrified,
Lone, sobbing, hunted by the hounds of heaven,
A wounded and forsaken soul, thou flee
Through the long torture of the centuries,
Nor many lives exhaust the tireless Wrath
Hell cannot slake nor heaven’s mercy assuage.

इन व्योमों में जहां आवेश ने जीवित रहने की आशा की थी वहां घोर त्रास बसता है,
ऐसा न हो कहीं अज्ञेय के विद्युती घन आरम्भ हो जायें, और, तू डर जाये,
तब अकेली, रोती, स्वर्ग के रक्षकों द्वारा खदेड़ी जाये,
एक आहत परित्यक्ता जीवात्मा, तू भागती फिरे,
शताब्दियों की दीर्घ यातना से तुझे गुजरना पड़े,
इस अथक रौद्र विनाश के मध्य कोई जीवन नहीं बच सकता है
उसे नरक में भी शान्ति नहीं मिलती न ही देव-कृपा शान्त कर पाती है।

I will take from thee the black eternal grip:
Clasping in thy heart thy fate’s exigiuous doles
Depart in peace, if peace for man is just.”

मैं तुझे इस काली शाश्वत रात्रि की जकड़न से मुक्त कर दूंगा:
अपनी छाती से भाग्य के इस अल्पदान को चिपका कर
शान्ति से विदा हो जा, यदि यह शान्ति मानव हित न्यायोचित है।’’

But Savitri answered meeting scorn with scorn,
The mortal woman to the dreadful Lord:
“Who is this God imagined by thy night,
Contemptuously creating worlds disdained,
Who made for vanity the brilliant stars?

किन्तु सावित्री ने इस तिरस्कार का उत्तर अवज्ञा से दिया,
नश्वर मानवी ने उस विकराल घोर प्रभु से कहाः
‘‘तेरी इस रात्रि द्वारा कल्पित यह कौन-सा ईश्वर है,
जिसने अवमानना से भर इन उपेक्षित लोकों को रचा है,
किसने इन चमकते तारों को गर्व से भर निष्फल ही निर्माण किया है?

Not he who has reared his temple in my thoughts
And made his sacred floor my human heart.

यह तो वह नहीं है जिसने मेरे विचारों में अपना मन्दिर पोषित किया है
और मेरे मानव हृदय को अपना पावन तीर्थ बनाया है।

My God is Will and triumphs in his paths,
My God is Love and sweetly suffers all.

मेरा प्रभु तो संकल्प है और वह अपने मार्गों का विजेता है,
मेरा प्रभु प्रेम है और वह मधुरता से सब भोगता है।

To him I have offered hope for sacrifice
And gave my longings as a sacrament.

उसी के लिए मैंने आशा की आहुति अर्पित की है
अपनी लालसाएं एक प्रसाद सम उसे समर्पित की हैं।

Who shall prohibit or hedge in his course,
The wonderful, the charioteer, the swift?[591]

उस आद्भुत्य की, रथी की, वेग गति में
कौन बाधा डालेगा या मार्ग रोकेगा?

A traveller of the million roads of life,
His steps familiar with the lights of heaven
Tread without pain the sword-paved courts of hell;
There he descends to edge eternal joy.

जीवन के लक्ष-लक्ष मार्गों पर विचरता एक यात्री है,
स्वर्ग के प्रकाशों से परिचित उसके चरण नरक की
छुरियों से मढ़े आंगनों के फर्श पर बिना पीड़ा के विचरते हैं;
वह तो पृथ्वी पर शाश्वत आनन्द की धार और तीखी बनाने उतरा है।

Love’s golden wings have power to fan thy void:
The eyes of love gaze starlike through death’s night,
The feet of love tread naked hardest worlds.

प्रेम के स्वर्ण-पंख तेरे शून्य को उड़ाने की शक्ति रखते हैं:
मृत्यु की निशा के मध्य भी प्रियतम के नेत्र तारे सम चमकते हैं,
प्रेम के नंगे पांव लोकों की कठोरतम धरती पर चल सकते हैं।

He labours in the depths, exults on the heights;
He shall remake thy universe, O Death.”

वह गहनताओं में परिश्रम से जुटा है, शिखरों पर उत्साह से भरा है;
हे यम, वह तेरे विश्व की पुनर्रचना करेगा।’’

She spoke and for a while no voice replied,
While still they travelled through the trackless night
And still that gleam was like a pallid eye
Troubling the darkness with its doubtful gaze.

उसकी वाणी का कुछ काल तक किसी वाचा ने उत्तर नहीं दिया,
जब कि अभी भी वे उस पथहीन रात्रि के मध्य यात्रा कर रहे थे
और अभी भी वह किरण एक निस्तेज नेत्र सम चमक रही थी,
अपनी शंकित चितवन से उस रात्रि को व्यथित कर रही थी।

Then once more came a deep and perilous pause
In that unreal journey through blind Nought;
Once more a Thought, a Word in the void arose
And Death made answer to the human soul:
“What is thy hope? to what dost thou aspire?

तब फिर से एक बार उस अंधी काल-रात्रि की शून्यता में
उस असत् यात्रा के मध्य एक गहन संकटपूर्ण विराम आ गया;
एक बार पुनः एक दैवी-विचार, एक अनादि शब्द, उस शून्य में उठा
और मृत्युदेव ने उस मानवीय आत्मा को उत्तर दिया:
‘‘यह तेरी आशा क्या है? तू क्या अभीप्सा करती है?

This is thy body’s sweetest lure of bliss,
Assailed by pain a frail precarious form,
To please for a few years thy faltering sense
With honey of physical longings and the heart’s fire
And a vain oneness seeking to embrace
The brilliant idol of a fugitive hour.

यह तो तेरी देह हित सुखानन्द का अति मधुर प्रलोभन है,
यह पीड़ा से आक्रामित, एक दुर्बल क्षणभंगुर आकार है,
जो तेरे अस्थिर चंचल इन्द्रिय-बोध को कुछ वर्ष की अवधि तक
अपनी दैहिक लालसाओं और हृदय की अग्नि से प्रसन्न रखेगा
और तू इस क्षणिक तेजस्वी प्रतिमा के एक घड़ी-भर के
आलिंगन में, निष्फल ही चरम पूर्णत्व की एकता खोज रही है।

And thou, what art thou, soul, thou glorious dream
Of brief emotions made and glittering thoughts,
A thin dance of fireflies speeding through the night,
A sparkling ferment in life’s sunlit mire?

और तू, क्या है तू, आत्मा, तेरा यह भव्य सपना
जो क्षणिक भावनाओं और चमकते विचारों से बना,
यह तो जुगनुओं का एक क्षणिक नृत्य है जो इस अज्ञरात्रि में शीघ्र बीत जायेगा,
यह जीवन की धूप में चमकती कीच में उफनता एक बुलबुला है?

Wilt thou claim immortality, O heart,
Crying against the eternal witnesses
That thou and he are endless powers and last?

ओ प्राण सत्ता, क्या तू अभी भी अमरत्व पर अधिकार जतायेगी,
शाश्वत द्रष्टाओं के विरोध में गुहार मचायेगी
कि केवल तू और वह अनन्त और अन्तिम शक्तियां हैं?

Death only lasts and the inconscient Void.

अरे! यहां केवल मृत्यु और यह अचित् महाशून्य सनातन है।

I only am eternal and endure.

केवल मैं शाश्वत और अविनाशी हूं।

I am the shapeless formidable Vast,
I am the emptiness that men call Space,
I am a timeless Nothingness carrying all,[592]
I am the Illimitable, the mute Alone.

मैं ही निराकारी घोर भीषण विराट् हूं,
मानव जिसे महाकाश पुकारता है मैं वही शून्यता हूं,
मैं सबका धारणकर्ता अकाल अनन्त असत् ब्रह्म हूं,
मैं असीम हूं, निःशब्द परम-कैवल्य हूं।

I, Death, am He; there is no other God.

मैं अहंकार हूं, मैं मृत्यु हूं, तत् सत् हूं मेरे सिवाय अन्य ईश्वर नहीं है।

All from my depths are born, they live by death;
All to my depths return and are no more.

सब मेरे गहन-गर्भ से उत्पन्न होते हैं, मृत्यु द्वारा जीवित रहते हैं;
और सब मेरी गहनताओं में लौट जाते हैं और निःशेष हो जाते हैं।

I have made a world by my inconscient Force.

मैंने अपनी अचित् महाशक्ति के द्वारा एक जगत् रच डाला है।

My force is Nature that creates and slays
The hearts that hope, the limbs that long to live.

यह विश्व-प्रकृति मेरी तेजस्विनी ऊर्जा है जो सर्जन करती और हनन करती है
प्रत्याशी हृदयों का और उन अंगों का जो जीवन की लालसा रखते हैं।

I have made man her instrument and slave,
His body I made my banquet, his life my food.

मैंने ही मानव को उसका साधन और दास बनाया है,
उसका शरीर मेरा प्रिय खाद्यान्न है, उसका जीवन मेरा भोजन है।

Man has no other help but only Death;
He comes to me at his end for rest and peace.

केवल मृत्यु को छोड़कर मानव के पास अन्य कोई सहायक नहीं है;
अन्त में वह मेरे पास विश्राम और शान्ति के लिए आता है।

I, Death, am the one refuge of thy soul.

मैं, यम, तेरी आत्मा का एकमात्र आश्रय हूं।

The gods to whom man prays can help not man;
They are my imaginations and my moods
Reflected in him by illusion’s power.

वे देवता जिन्हें मानव पूजता है उसकी सहायता नहीं कर सकते;
वे तो मेरे ही कल्पित आकार और मेरे मनोभाव हैं
जो मायावी शक्ति द्वारा उसके अन्तर में आभासित होते हैं।

That which thou seest as thy immortal self
Is a shadowy icon of my infinite,
Is Death in thee dreaming of eternity.

यह जिसे तू अपना अमर चैत्य तत्त्व सम देखती है
यह मेरे नित्य तत्त्व की छायाभासी छवि है,
यह तेरे अन्तर में बसा मृत्युदेव अमरता का स्वप्न देख रहा है।

I am the Immobile in which all things move,
I am the nude Inane in which they cease:
I have no body and no tongue to speak,
I commune not with human eye and ear;
Only thy thought gave a figure to my void.

मैं ही अचल ध्रुव हूं जिसमें सकल पदार्थ गति करते हैं,
मैं ही नग्न शून्य ब्रह्म हूं जिसमें सब निःशेष हो जाते हैं:
मेरी कोई काया नहीं है और बीत्ननै को कोई जिहवा नहीं है
मैं मानवीय नेत्र और कान से सम्पर्क नहीं करता हूं;
केवल तेरे संकल्प-चिन्तन ने मेरे शून्य को एक आकार दिया है।

Because, O aspirant to divinity,
Thou calledst me to wrestle with thy soul,
I have assumed a face, a form, a voice.

ओ, देवत्व की अभीप्सु, महत्वाकांक्षी मानवी,
क्योंकि तूने मुझे अपनी आत्मा से लड़ने को चुनौती दी,
मुझे एक रूप, एक आकार, एक वाणी धारण करनी पड़ी।

But if there were a being witnessing all,
How should he help thy passionate desire?

किन्तु यदि इस समस्त की एक साक्षी सर्वद्रष्टा परम सत्ता होती,
तो वह किस प्रकार तेरे हृदय की अनुरागी कामना की पूर्ति में सहायक होती?

Aloof he watches sole and absolute,
Indifferent to thy cry in nameless calm.

वह एकाकी और परम तत्त्व निरपेक्षता में सब अवलोकता है,
अपनी अनामी शान्ति में वह तेरी पुकार के प्रति उदासीन है।

His being is pure, unwounded, motionless, one.

वह परम पुनीत परम सत्ता, अनाहत, अचल, अद्वितीय है।

One endless watches the inconscient scene
Where all things perish, as the foam the stars.

इस अचित् दृश्यावलि को वह कैवल्य अनन्तता से देखता है
जहां समस्त पदार्थ नष्ट हो जाते हैं, बुलबुलों समान तारे मिट जाते हैं।

The One lives for ever. There no Satyavan
Changing was born and there no Savitri
Claims from brief life her bribe of joy. There love [593]
Came never with his fretful eyes of tears,
Nor Time is there nor the vain vasts of Space.

वह परमैकम् सतत बना रहता है। वहां कोई सत्यवान्
परिवर्तन को प्राप्त होता उत्पन्न नहीं हुआ और न कोई सावित्री है
जो क्षणभंगुर जीवन से हर्ष की रिश्वत का अपना अधिकार मांगती है।
वहां प्रेम अपने व्यथित अश्रुपूरित नेत्रों से कभी नहीं आता है,
वहां दिक्काल नहीं है और विश्वाकाश के असार विस्तारों का अभाव है।

It wears no living face, it has no name,
No gaze, no heart that throbs, it asks no second
To aid its being or to share its joys.

प्रेम अरूप, निराकारी है, जीवन से परात्पर अनामी है,
उसकी कोई दृष्टि नहीं है, धड़कता हृदय भी नहीं है; वह अद्वितीय किसी से
अपने आनन्द की भागीदारी की या सत्ता की सहायता की अपेक्षा नहीं करता।

It is delight immortally alone.

वह तो आनन्दघन चिरन्तन कैवल्य है।

If thou desirest immortality,
Be then alone sufficient to thy soul:
Live in thyself; forget the man thou lov’st.

यदि तू अमरत्व चाहती है,
तब तू निज आत्मरति की परिपूर्णता में एकाकी डूब जा:
अपने सत्-तत्त्व में निवास कर, अपने प्रिय इस नर को भूल जा।

My last grand death shall rescue thee from life;
Then shalt thou rise into thy unnamed source.”

मेरी अन्तिम भव्य स्थिति मृत्यु तुझे तेरे जीवन से मुक्त कर देगी,
तब तू अपने अचल स्थिर मूलस्रोत में उठ जायेगी।’’

But Savitri replied to the dread Voice:
“O Death, who reasonest, I reason not,
Reason that scans and breaks, but cannot build
Or builds in vain because she doubts her work.

किन्तु सावित्री ने उस घोर दैववाणी को उत्तर दियाः
‘‘हे तार्किक यमराज, मैं तर्क में नहीं पड़ती,
बौद्धिक तर्क परीक्षण-निरीक्षण करता और विच्छेदन करता है, सर्जन नहीं कर सकता
या व्यर्थ का निर्माता है क्योंकि वह अपने कार्य पर शंका करता है।

I am, I love, I see, I act, I will.”

मैं सत् हूं, मैं प्रेम हूं, मैं द्रष्टा हूं, मैं कर्म हूं, और संकल्प हूं।’’

Death answered her, one deep surrounding cry:
“Know also. Knowing, thou shalt cease to love
And cease to will, delivered from thy heart.
So shalt thou rest for ever and be still,
Consenting to the impermanence of things.”

तब मृत्यु ने एक गम्भीर चहुं ओर से घेरते चीत्कार में उसे उत्तर दिया:
‘‘तब आत्मज्ञानी भी बन। आत्मज्ञान पाकर तू प्रेम को त्याग देगी
और संकल्प भी मिट जायेगा, अपने हृदय से मुक्ति पा जायेगी।
फिर तू सतत विश्रान्ति में स्थिर हो जायेगी,
और पदार्थों की अनित्यता को स्वीकार लेगी।’’

But Savitri replied for man to Death:
“When I have loved for ever, I shall know.

पर मानवता का पक्ष लेती सावित्री यम से बोली:
‘‘जब मैं अनन्तता तक प्रेम कर लूंगी, तब यह ज्ञान पा लूंगी।

Love in me knows the truth all changings mask.

मेरा अन्तरवासी प्रेम इन परिवर्तनशील मुखौटों का सत्य जानता है।

I know that knowledge is a vast embrace:
I know that every being is myself,
In every heart is hidden the myriad One.

मैं जानती हूं कि ज्ञान का क्षेत्र एक विस्तृत आलिंगन है:
मुझे ज्ञान है कि प्रत्येक जीव में आत्मा मैं स्वयं हूं,
प्रत्येक अन्तर में कोटि-कोटि रूपों में एक ही प्रभु गोपित है।

I know the calm Transcendent bears the world,
The veiled Inhabitant, the silent Lord:
I feel his secret act, his intimate fire;
I hear the murmur of the cosmic Voice.

मुझे ज्ञात है कि शान्त परात्पर-परमेश इस जगत् का धारणकर्ता है,
वही मौन नीरव स्वामी, अवगुंठित अन्तरवासी प्रभु है:
उसके गुह्य कार्य की, उसकी अभिन्न अग्नि की मैं अनुभूति पाती हूं;
उसकी ब्रह्माण्डीय दिव्यगिरा की गुंजन मैं सुन पाती हूं।

I know my coming was a wave from God.

मैं जानती हूं कि मेरा आगमन प्रभु की ही एक लहर थी।

For all his suns were conscient in my birth,
And one who loves in us came veiled by death.
Then man was born among the monstrous stars
Dowered with a mind and heart to conquer thee.” [594]

क्योंकि उसके सकल सूर्य मेरे जन्म पर चैतन्य थे,
और हममें एक जो प्रेमी है वह मृत्यु की चादर में छिपा आया था
तभी मनुज जब इस विशाल घोर तारों के मध्य जन्मा था
उसे एक मन और प्राण तुझे जीतने के लिए दिया गया था।’’

In the eternity of his ruthless will
Sure of his empire and his armoured might,
Like one disdaining violent helpless words
From victim lips Death answered not again.

अपने निर्दयी संकल्प की शाश्वतता में सुरक्षित
अपने साम्राज्य और अपनी क्वचित् शक्ति में निश्चिन्त
यम देवता उन उग्र असहाय शब्दों की अवहेलना करता गया
जिन्हें पीड़ित अधरों ने उच्चारा था, और उसने उत्तर नहीं दिया।

He stood in silence and in darkness wrapped,
A figure motionless, a shadow vague,
Girt with the terrors of his secret sword.

वह अन्धकार से लिपटा मौन खड़ा था,
अचल एक आकार बना, एक धूमिल छायाकृति प्रेत-सी
निज विकराल भयों की गुह्य तलवार की पेटी से कसा हुआ था।

Half-seen in clouds appeared a sombre face;
Night’s dusk tiara was his matted hair,
The ashes of the pyre his forehead’s sign.

तब काल मेघों में एक निराशा का मुख अर्ध-गोचर प्रकटा,
जिसके जटाधारी केशों पर निशा का धूमिल त्रिजटीय मुकुट धरा था
चिताओं की राख का उसके मस्तक पर तिलक था।

Once more a Wanderer in the unending Night,
Blindly forbidden by dead vacant eyes,
She travelled through the dumb unhoping vasts.

उस असीम शाश्वत रात्रि में एक बार पुनः पर्यटक बनी,
मृत-सूनी आंखों द्वारा अन्धता से अस्वीकृत निषेधित-सी,
सावित्री उन मूक नैराश्य के विस्तारों के मध्य घूमने लगी।

Around her rolled the shuddering waste of gloom,
Its swallowing emptiness and joyless death
Resentful of her thought and life and love.

उसके चारों ओर निराशा की उजाड़ कांपती शून्यता फैली थी,
इसकी कालग्रसित रिक्तता और निरानन्दी मृत्यु
सावित्री के प्रेम और जीवन के संकल्प पर कुपित थी।

Through the long fading night by her compelled,
Gliding half-seen on their unearthly path,
Phantasmal in the dimness moved the three.[595]

उस दीर्घ निस्तेज होती रात्रि के मध्य उससे बाध्य बनी,
मानों अपने अपार्थिव मार्ग पर अर्धगोचर से उड़ते
उस धूसरता में वे तीन प्रेतछायाएं जैसे गतिशील थे।

END OF CANTO TWO
END OF BOOK NINE